Saturday, October 17, 2020

ज़िक्र

ये जो महफ़िल है, यू ही आबाद रहे, ये शाम कभी तमाम न हो

दवा हो, दारू हो, तेरा ज़िक्र हो और इस आशिक को कभी आराम न हो


और ये जो शायर है, न जाने किस दर्द का मारा है

मालूम होता है, इसके अपनों ने ही इसके दिल में खंजर उतारा है


इसके दर्द का हिसाब तो बस कुछ इस तरह बयान है

की

तेरे होने से जो बरकत थी, वो समां अब कहां है

तेरे दिए ज़ख्म भी आज तक हरे हैं, मेरा कल का लगाया पेड़ भी आज फना है



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